पत्रिका का उद्देश्य

‘साहित्य संस्कृति पत्रिका’ (त्रैमासिक) का मिशन साहित्य और संस्कृति को समाज की सक्रिय बौद्धिक तथा संवेदनात्मक चेतना के रूप में स्थापित करना है। यह पत्रिका रचनात्मक लेखन, आलोचनात्मक विमर्श तथा शोधपरक अध्ययन के माध्यम से सामाजिक यथार्थ, ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक संरचनाओं और मानवीय संवेदनाओं के बहुआयामी रूपों को सामने लाने का प्रयास करती है। पत्रिका का उद्देश्य साहित्यिक अभिव्यक्तियों को सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए विचार, संवाद और बहस के लिए एक ऐसा मंच निर्मित करना है, जहाँ विभिन्न वैचारिक दृष्टियाँ सह-अस्तित्व में विकसित हो सकें। यह पत्रिका परंपरा और समकालीनता के बीच संवाद को महत्त्व देती है तथा हाशिए के अनुभवों, जनजीवन और सांस्कृतिक विविधताओं को गंभीरता से प्रस्तुत करते हुए साहित्य की सामाजिक भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्यरत है।

पत्रिका का दृष्टिकोण

‘साहित्य संस्कृति पत्रिका’ (त्रैमासिक) का विज़न हिंदी साहित्य और सांस्कृतिक विमर्श के क्षेत्र में एक गंभीर बौद्धिक मंच के रूप में विकसित होना है जहां साहित्य को समाज से पृथक मानने की प्रवृत्ति के स्थान पर उसे सामाजिक संरचनाओं, ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और सांस्कृतिक व्यवहारों से गहरे रूप में संबद्ध करके देखा जाए। यह पत्रिका भविष्य में ऐसे वैचारिक हस्तक्षेप की भूमिका निभाना चाहती है जो साहित्य संस्कृति और समाज के बीच मौजूद जटिल अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि प्रदान करे। इसका दृष्टिकोण परंपरा के आलोचनात्मक पुनर्पाठ और समकालीन यथार्थ की विवेचना के माध्यम से नए बौद्धिक संदर्भ निर्मित करने पर केंद्रित है। पत्रिका का विज़न ऐसे लेखन को सामने लाना है जो अनुभवजन्य गहराई, शोधपरक गंभीरता और वैचारिक स्पष्टता से युक्त हो ताकि साहित्यिक अध्ययन अकादमिक दायरे तक सीमित न रहकर सामाजिक चेतना का हिस्सा बन सके। इस दृष्टि के साथ यह पत्रिका हिंदी की एक ऐसी पत्रिका के रूप में स्थापित होना चाहती है जो समय, समाज और विचार के बीच सतत संवाद को संभव बनाए।

  • समीक्षित प्रकाशन प्रणाली : पत्रिका में प्रकाशित आलेख तथा शोध-आलेख संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया के अंतर्गत चयनित किए जाते हैं, जिससे वैचारिक स्तर तथा अकादमिक गंभीरता बनी रहती है।
  • पीयर-रिव्यू आधारित मूल्यांकन : शोध-आलेखों का परीक्षण विषय-विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है, ताकि शोध की प्रामाणिकता संदर्भ-सजगता तथा विश्लेषणात्मक गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके।
  • मौलिक लेखन को प्राथमिकता : पत्रिका में प्रस्तुत सामग्री अप्रकाशित तथा मौलिक होनी अपेक्षित है। बौद्धिक ईमानदारी को प्रकाशन नीति का आधार माना गया है।
  • प्लैगरिज़्म-रहित सामग्री : किसी भी प्रकार की नकल या अस्वीकृत स्रोतों पर आधारित लेखन को स्वीकार नहीं किया जाता। साहित्यिक नैतिकता का पालन अनिवार्य है।
  • प्रिंट तथा डिजिटल प्रकाशन : पत्रिका का प्रकाशन डिजिटल माध्यम में किया जाता है, लेकिन समयानुसार इसे मुद्रित माध्यम में भी उपयोग में लाया सकता है जिससे पत्रिका की पाठकों तक व्यापक पहुँच संभव हो सके।
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सक्रिय उपस्थिति : वेबसाइट तथा डिजिटल माध्यमों के द्वारा पत्रिका की गतिविधियाँ नियमित रूप से प्रस्तुत की जाती हैं, जिससे साहित्यिक संवाद को निरंतर बनाए रखा जा सके।
  • अकादमिक तथा रचनात्मक संतुलन : पत्रिका में शोध-आलेख, आलोचनात्मक लेखन तथा रचनात्मक विधाओं को संतुलित स्थान प्रदान किया जाता है।
  • गंभीर साहित्यिक विमर्श का मंच : यह पत्रिका साहित्य संस्कृति समाज से जुड़े प्रश्नों पर विचारपरक लेखन को प्रोत्साहित करती है, जिससे समकालीन बौद्धिक संवाद को दिशा मिल सके।
  • युवा लेखकों तथा शोधार्थियों को अवसर : नए रचनाकारों तथा शोधार्थियों के लिए गुणवत्ता-आधारित मंच उपलब्ध कराया जाता है, जिससे साहित्यिक परंपरा का विस्तार हो सके।
  • गंभीर साहित्यिक विमर्श का मंच : यह पत्रिका साहित्य संस्कृति समाज से जुड़े प्रश्नों पर विचारपरक लेखन को प्रोत्साहित करती है, जिससे समकालीन बौद्धिक संवाद को दिशा मिल सके।
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Sahitya Sanskriti Patrika
Multidisciplinary-Multilingual Quarterly E-Magazine Of Literature, Society & Culture

प्रकाशक: साहित्य संस्कृति पत्रिका समूह
प्रधान संपादक: डॉ. अनिल कुमार

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